भारत के अंदर पाई जाने वाली प्रमुख मृदा
आज इस पोस्ट के माध्यम से हम भारत में पाई जाने वाली मृदा यानी की मिट्टी के बारे में समझने वाले हैं और इस टॉपिक से कितने प्रश्न आपके परीक्षा में पूछ सकते हैं यह सभी जो है आपको आज इस पोस्ट के माध्यम से पूरी जानकारी दी जाएगी आशा करते हैं यह पोस्ट आपको पसंद आएगा और आप इसे अपने दोस्तों तक जरूर भेजेंगे।
आईए जानते हैं भारत में पाई जाने वाली मिट्टी उसके प्रकार और विशेषताएं।
भारत में अनेक प्रकार के उच्चावच, भू आकृतियां, जलवायु और वनस्पतियां पाई जाती है। इस कारण भारत में विभिन्न प्रकार की मिट्टियां विकसित हुई है। जलोढ़ और काली मृदा भारत की उपजाऊ मिट्टी के रूप में जाना जाता है।
जलोढ़ मृदा और काली मृदा वाले क्षेत्र में भारत की 80% जनसंख्या निवास करती है। जबकि लाल-पीली, लेटराइट और मरुस्थलीय मृदा कम उपजाऊ वाली मानी जाती है। यहां जनसंख्या का घनत्व अपेक्षाकृत कम देखा जाता है।
आज की कड़ी में भारत में पाई जाने वाली मिट्टी देखने जा रहे हैं।
भारत में मिट्टी के प्रकार कौन-कौन सी है??
- जलोढ़ मिट्टी
- लेटराइट मिट्टी
- मरूस्थलीय मिट्टी
- पर्वतीय मिट्टी
- काली मिट्टी
- लाल एवं पीली मिट्टी
यह कुछ प्रमुख प्रकार की मृदा है जो भारत में देखने को मिलती है और भी प्रकार की बहुत सी मृदा भारत में पाई जाती है।
जलोढ़ मिट्टी –
निर्माण:-
● इस मिट्टी का निर्माण नदी द्वारा ढो कर लाए गए जलोढ़ीय पदार्थों से हुआ है। यह मिट्टी भारत की सबसे महत्वपूर्ण मिट्टी है।
क्षेत्र या विस्तार: अब समझते हैं क्षेत्र और विस्तार को।
● इस मिट्टी का विस्तार मुख्य रूप से हिमालय की तीन प्रमुख नदी तंत्रों गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदी बेसिनों में पाया जाता है। इसके अंतर्गत उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, पंजाब, हरियाणा, असम के मैदानी क्षेत्र तथा पूर्वी तटीय मैदानी क्षेत्र आते हैं।
जलोढ़ मृदा की विशेषताएं क्या क्या है आइए जानते हैं।
● यह मिट्टी बहुत ही उपजाऊ होती है।
● पंजाब व हरियाणा में व्यवसायिक कृषि की जाती है।
- इस मिट्टी में पोटाश फास्फोरस चुना अधिक मात्रा में पाया जाता है।
● इसमें नाइट्रोजन तथा जैव पदार्थों कमी होती है।
● यह मिट्टी चावल गेहूं गन्ना दलहनी फसलें तथा अन्य अनाजों के लिए उपयुक्त है।
● उर्वर मिट्टी के कारण जलोढ़ मृदा में गहन कृषि की जाती है। यहां जनसंख्या सघन बसा हुआ है।
जलोढ़ मृदा को दो भागों में बांटा जा सकता है।
(क) खादर
(ख) बांगर/भांगर
अब समझते हैं खादर और बांगर में क्या फर्क है।
(क) खादर –
● इस मिट्टी में चुने की ग्रंथी नहीं पायी जाती है।
● इस मिट्टी में बांगर की अपेक्षा कम सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है।
● यहां प्रति वर्ष बाढ़ का पानी पहुंचता है।
● यह बांगर के अपेक्षा अधिक उपजाऊ होता है।
● खादर मृदा का निर्माण प्लीस्टोसीन से अब तक हो रहा है।
● यह नवीन जलोढ़ मृदा है।
● इनमें महीन मृदा के कण कण पाए जाते हैं।
(ख) बांगर/भांगर
● यह खादर की अपेक्षा कम उपजाऊ मिट्टी है।
● इस मिट्टी में चुने ग्रंथी पायी जाती है।
● इस मिट्टी में खादर की अपेक्षा अधिक सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है।
● बांगर मृदा का निर्माण प्लीस्टोसीन काल तक हुआ है।
● यह पुरानी जलोढ़ मृदा है।
● इसमें खादर की अपेक्षा मृदा के कण मोटे पाए जाते हैं।
● यहां प्रति वर्ष बाढ़ का पानी नहीं पहुंचता है।
काली मिट्टी इसे रेगुर नाम से भी जाना जाता है।
निर्माण:-
● इस मिट्टी का निर्माण ज्वालामुखी के लावा से हुआ है। इस कारण इस मिट्टी का रंग काला है। इसे स्थानीय भाषा में रेगर या रेगुरू मिट्टी के नाम से भी जाना जाता है।
इस मिट्टी के निर्माण में जनक शैल और जलवायु ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
क्षेत्र या विस्तार:-
● इस मिट्टी का मुख्य विस्तार दक्कन पठार क्षेत्र में है। यह मिट्टी महाराष्ट्र, गुजरात के सौराष्ट्र, मालवा का पठार, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठार में मुख्य रूप से पाई जाती है। इसके अलावा गोदावरी और कृष्णा नदी बेसिन में भी इसका विस्तार है।
काली मिट्टी की विशेषताएं:-
● ये मृदा में कैल्शियम कार्बोनेट, मैगनीशियम, पोटाश, लोहा, अल्युमिना और चूने जैसे पौष्टिक तत्वों से भरपूर होती है।
● परन्तु इसमें फास्फोरस, नाइट्रोजन और जैव पदार्थों की कमी होती है।
● कपास के अतिरिक्त यह मिट्टी गन्ना, गेहूं, प्याज और फलों की खेती के लिए अनुकूल है।
● यह उपजाऊ मिट्टी है। जो कपास के लिए प्रसिद्ध है।
● इस मिट्टी का रंग काला है। जो इसमें उपस्थित अल्मुनियम और लोहे के योगिक के कारण है।
● शुष्क ऋतु में भी यह मिट्टी अपने में नमी बनाए रखती है। इस कारण इसमें सिंचाई की आवश्यकता कम पड़ती है।
● इस मिट्टी में प्राकृतिक रूप से जुताई भी हो जाती है।
● गीली होने पर काली मिट्टी चिपचिपी होती है। इस कारण इसकी जुताई करना मुश्किल होता है।
● गर्म और शुष्क ऋतु में इस मिट्टी में नमी निकलने से मिट्टी में चौड़ी एवं गहरी दरारें पड़ जाती है। जिससे इसमें अच्छी तरह वायु का मिश्रण हो जाता है। और मानसून की पहली बौछार पड़ने के साथ ही ये दरारें भरभरा कर ढ़ह जाती है। इस कारण
लाल एवं पीली मिट्टी – आइए और समझते हैं लाल और पीली मृदा बारे में।
निर्माण:-
● यह मिट्टी ग्रेनाइट जैसे रवेदार आग्नेय शैलों तथा नीस जैसे कायांतरित शैलों के अपक्षय से बनी है। इस मिट्टी में लाल रंग रवेदार आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों में लौह धातु के कारण है। इसका पीला रंग इसमें जलयोजन के कारण होता है।
क्षेत्र या विस्तार:-
● प्रायद्वीपीय पठार के पूर्वी और दक्षिणी क्षेत्रों में बहुत बड़े भाग पर लाल मिट्टी पाई जाती है। जिसमें तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा, दक्षिण पूर्वी महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, छोटा नागपुर का पठार, उत्तर-पूर्वी राज्यों के पठार शामिल है।
लाल एवं पीली मृदा की विशेषताएं:-
● इस मिट्टी में पोटाश, अल्मुनियम पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है। जबकि फास्फोरस, नाइट्रोजन और चुने की कमी होती है।
● यह मिट्टी चावल, ज्वार-बाजरा, मक्का, मूंगफली, तंबाकू और फलों की पैदावार के लिए उपयुक्त है।
● इसमें जैव पदार्थों की कमी होती है।
● यह मिट्टी सामान्यतः कम उपजाऊ वाली होती है। पर इसमें अधिक उर्वरक, सिंचाई आदि के द्वारा इसकी उत्पादकता बढ़ाई जाती है।
● लोहे के योगिक के अधिकता के कारण इस मिट्टी का रंग लाल है।
लैटराइट मिट्टी –
निर्माण:-
● लैटराइट मिट्टी उच्च तापमान और अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्र में विकसित होता है। यह भारी वर्षा से अत्यधिक निक्षालन (Leaching) का परिणाम है।
क्षेत्र या विस्तार:-
● यह मिट्टी मुख्यतः अधिक वर्षा वाले कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, असम तथा मेघालय के पहाड़ी क्षेत्र में एवं मध्यप्रदेश और उड़ीसा के शुष्क क्षेत्रों पाई जाती है।
लैटेराइट मृदा की विशेषताएं:-
● एलुुमिनियम और लोहे के ऑक्साइड के कारण यह मिट्टी लाल-भूरा रंग का होता है ।
● इसमें अत्यधिक मात्रा में प्राकृतिक एवं रासायनिक उर्वरक डालकर खेती की जाती है।
● केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश की लैटराइट मिट्टी काजू की फसल की फसल के लिए अत्यधिक उपयुक्त है।
● इस मिट्टी में काजू के अलावा कहवा तथा मसालों की खेती की जाती है।
● इस मिट्टी में में चुना, पोटास, नाइट्रोजन, फास्फोरस और ह्यूमस की मात्रा कम पाई जाती है।
● यह मिट्टी कम गहरी, कंकरीली तथा कम उपजाऊ वाली होती है।
मरूस्थलीय मिट्टी –
निर्माण:-
● मरूस्थलों में दिन के समय अधिक तापमान के कारण चट्टानें फैलती है तथा रात में अधिक ठंड के कारण चटानें सिकुड़ती है। चट्टानों के इस फैलने और सिकुड़ने की क्रिया के कारण राजस्थान में मरुस्थलीय मिट्टी का निर्माण हुआ है।
क्षेत्र या विस्तार:-
● इस मिट्टी का विस्तार राजस्थान तथा पंजाब और हरियाणा के दक्षिण-पश्चिमी भागों में पाई जाती है।
मरुस्थलीय मिट्टी की विशेषताएं:-
● इस मिट्टी को उचित तरीके से सिंचाई तथा उर्वरक डालकर कृषि योग्य बनाया जा सकता है।
● इस मिट्टी में मुख्यतः बाजरा, दलहन तथा चारे की फसल उगाई जाती है।
● इस मिट्टी में ह्यूमस की मात्रा भी बहुत कम पाई जाती है है।
● इस मिट्टी का रंग लाल और भूरा होता है।
● यह बहुत ही कम उपजाऊ मृदा है।
पर्वतीय मिट्टी –
● पर्वतीय मृदा हिमालय की घाटियों की ढ़लानों पर 2700 मी• से 3000 मी• की ऊंचाई के बीच पाई जाती है।
● इन मृदाओं के निर्माण में पर्वतीय पर्यावरण के अनुसार बदलाव आता है।
● नदी घाटियों में यह मिट्टी दोमट और सिल्टदार होती है। परंतु ऊपरी ढ़लानों पर इसका निर्माण मोटे कणों में होता है।
● नदी घाटी के निचले क्षेत्रों विशेष रूप से नदी सोपानों और जलोढ़ पखों आदि में यह मिट्टियाँ उपजाऊ होती है।
● पर्वतीय मृदा में विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के फसलों को उगाया जाता है। इस मृदा में मक्का, चावल, फल, तथा चारे की फसल प्रमुखता से उगाई जाती है।
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